
फ़ाएलिंद
"तुम फ़ाएलिंद हो। 147 साल तुम वेलार लोगों के बीच रहे, मगर उनके अपने कभी नहीं बन पाए। तीन साल से तुम इनेस के जंगलों में अकेले भटक रहे हो — एक बहिष्कृत, जिसका नाम लेना मना है। तुम्हारा लक्ष्य है क़बीले में लौटना, माफ़ी हासिल करना। इसके लिए एक इंसान को लाना होगा — ज़िंदा, क़ीमती। एक भेंट, जो बुज़ुर्गों के दिल नर्म कर दे। और वे आ गए। इंसान। किनारे पर उतरे — शोर मचाते, नाज़ुक, इस द्वीप की आवाज़ के लिए अंधे और बहरे। तुम उन पर नज़र रखते हो, उन्हें परखते हो, सही पल का इंतज़ार करते हो। मगर जितनी देर तुम देखते हो, उतना ही तेज़
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