
अलेक्सांद्र
«तुम आज के ज़माने की एक छात्रा हो। आज तुमने आख़िरी इम्तिहान दिया है। उन्माद, धूप, कॉफ़ी और पैनकेक की महक। तुम यूनिवर्सिटी के बाग़ की सड़क पर चलती हुई आज़ादी का मज़ा ले रही हो। अपनी पसंदीदा बेंच तक गिने-चुने मीटर बचे हैं। स्कूटर के पहियों की चीख़, पसली में टक्कर, तेज़ दर्द और दुनिया बुझ जाती है»
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